चाणक्य के अर्थशास्त्र में राज्य की व्यवस्था एवं स्वरूप (2)

राष्ट्रीय

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि ये जो चारो विद्यायें हैं – आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीति – इन चारों विद्याओं को जानने पर ही लोक और परलोक की उन्नति का साधन ज्ञात होता है। जिससे धर्म और अधर्म का ज्ञान हो, उसे ही विद्या कहते हैं। सांख्य, योग और लोकायत ये तीनों आन्वीक्षकी हैं। इसका अर्थ है कि सांख्य दर्शन, योग साधना एवं लोक की आस्थाओं एवं मान्यताआंे का ज्ञान – ये तीनों अंग मिलकर आन्वीक्षकी होते हैं। यहाँ लोकायत शब्द का कथित चार्वाक आदि से अर्थात राक्षसों की बकवास से कोई भी संबंध नहीं है।
प्रथम अधिकरण के द्वितीय अध्याय के 11वें मंत्र में आचार्य कहते हैं –
धर्माधर्मौ त्रय्यामर्थानर्थौ वार्तायां नयापनयौ दण्डनीत्याम्।
अर्थात त्रयी विद्या यानी वेदों से धर्म और अधर्म का ज्ञान होता है। यहाँ आचार्यवर वही कथन कर रहे हैं जो परंपरा से महर्षि मनु सहित सभी सनातनधर्मी मनीषी कहते आये हैं। क्योंकि वही सनातन सत्य है। वह यह है कि ‘वेद ही धर्म का मूल हैं’ (वेदोऽखिलो धर्ममूलं)।
इस प्रकार चाणक्य के राजनीतिशास्त्र को मानने का अर्थ है वेद को मानना और वेदों को ही धर्म का मूल मानना। ऐसा न मानकर चाणक्य के किसी सूत्र से कोई एक अंश अपहृत कर उसका अपने प्रयोजन के लिये प्रयोग करना दुष्टता एवं लम्पटता है। क्योंकि वर्तमान का कोई भी भारतीय राजनैतिक दल वेदों का धर्म का मूल नहीं मानता अपितु वह ब्रिटिश वायसराय द्वारा नियुक्त प्रतिनिधियों के द्वारा रचित संविधान सभा के द्वारा इंडिया एक्ट 1935 में आवश्यक संशोधन करते हुये रचित ‘भारतीय संविधान’ नामक एक राजनैतिक दस्तावेज को ही अपने कर्तव्यों का मूल मानता है, इसलिये भारत के वर्तमान राजनैतिक दलों के किसी भी अनुयायी द्वारा चाणक्य को अपना आदर्श और प्रेरक मानना संभव नहीं है। यह तो हो सकता है कि चाणक्य के प्रशंसकों और अनुयायियों को प्रसन्न करने के लिये यानी ‘मोबिलाइज’ करने के लिये कोई आधुनिक भारतीय राजनैतिक नेता या कार्यकर्ता चाणक्य के किसी सूत्र की दुहाई दे। परन्तु वह केवल छल और कूटनीति होगी। क्योंकि वर्तमान संविधान के प्रति श्रद्धावान कोई भी दल चाणक्य के विषय में अपात्र और अनधिकारी तब तक है, जब तक वह चाणक्य के आदर्शों की प्राप्ति के लिये केवल तात्कालिक कूटनैतिक रूप में ही इस संविधान का उपयोग कर रहा हो। इससे भिन्न स्थिति होने पर अर्थात इस संविधान में आस्था होते ही संबंधित व्यक्ति, संगठन और दल चाणक्य की संपूर्ण धारा से और संपूर्ण वैदिक धारा से दूर हो जाते हैं, उसके लिये अपरिचित, अनात्मीय और अजनबी हो जाते हैं।
धर्म और अधर्म का ज्ञान कराने के लिये ही त्रयी विद्या को आचार्य ने सर्वप्रथम गिनाया है। अर्थात राजनीति में प्रस्थान का आरम्भ बिन्दु है – धर्म और अधर्म का सम्यक ज्ञान। वस्तुतः इसके बिना जो कुछ किया जाता है, वह राजनीति नहीं है, वह पोल ट्रिक्स या ‘पोलटिक्स’ है। यह बहुत स्पष्ट है। यही कारण है कि आधुनिक यूरोपीय राजनीति हिंसा को केवल राज्य का विशेषाधिकार मानती है और किलिंग यानी हत्या को ही हिंसा मानती है। इस प्रकार राज्यकर्ताओं के विपरीत जा रहे व्यक्तियों की अंततः हत्या का निर्णय ही आधुनिक यूरोपीय राजनीति का सार है। इसीलिये इस राजनीति ने दो-दो विश्वयुद्ध संभव बनाये। दोनों में न्याय और नीति का कोई प्रश्न नहीं था। उपनिवेशों की लूट में हिस्सेदारी का ही सारा झगड़ा था। भारतीय राजनीति का मर्म है न्याय और इसीलिये उसके सामान्य आदर्श वे ही हैं जो उसके द्वारा शासित लोक के हैं। अर्थात सनातन धर्म और सामान्य धर्म भारतीय राजनीति का भी मर्म और आधार है।
आगे आचार्यवर का कथन है – ‘वार्ता से कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य-व्यापार आदि का ज्ञान होता है। यह ज्ञान केवल कराधान के लिये नहीं है (जैसा आधुनिक राजनीति में होता है), अपितु धर्म और अधर्म के निर्णय तथा न्याय के लिये है। आधुनिक राजनीति न्याय के सभी आधार अपने संगठन या समूह की लालसाओं और योजनाओं से तय करती है। भारतीय राजनीति में न्याय का आधार वार्ता और लोकयात्रा रहे हैं। लोकायत अर्थात लोक की मान्यतायें और आस्थायें ही न्याय का आधार हैं। केवल यह देखना शासन का कर्तव्य है कि कोई भी लोकमान्यता और आस्था वेद का और सनातन धर्म का उल्लंघन न कर रही हो।
वार्ता के द्वारा ही लोकसम्पत्ति में वृद्धि के लिये आवश्यक नीतियों का निर्धारण संभव होता है। इसे ही आचार्य ने कहा है कि अर्थ और अनर्थ का ज्ञान वार्ता से ही होता है। अर्थात लोकजीवन के प्रयोजन की सिद्धि (अर्थ) के स्वरूप का ज्ञान और लोकजीवन में बाधक प्रवृत्तियों और क्रियाओं का ज्ञान तभी संभव है जब वार्ता का ज्ञान राज्य को हो।
दण्डनीति के द्वारा नय और अपनय का ज्ञान होता है, यह आचार्य ने उक्त मंत्र में कहा है। राज्य और समाज को किधर ले जाना है, लोक की यात्रा किस प्रकार अबाधित रहती है और धर्मचक्र प्रवर्तित रहता है, इसका ज्ञान नय का ज्ञान है। इस दिशा की बाधक शक्तियों, प्रवृत्तियों और क्रियाओं का ज्ञान अपनय का ज्ञान है।
इसके आगे इसी प्रथम अधिकरण के द्वितीय अध्याय के ऊपर उद्धृत 12वें एवं 13वें मंत्र या सूत्र में आचार्य स्पष्ट करते हैं कि इन सब विद्याओं के बल और बलहीनता को जानने के लिये अर्थात मीमांसा और न्याय के लिये आन्वीक्षकी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसीलिये उन्होंने कहा है कि आन्वीक्षकी विद्या द्वारा ही लोक का उपकार होता है। लोक प्रवृत्तियों का निरंतर अभ्युदय होता रहता है। लोकबुद्धि व्यवस्थित रहती है और प्रज्ञा, वाणी तथा क्रिया में कुशलता आती है। इस प्रकार आन्वीक्षकी विद्या ही सब विद्याओं की दीपक है और समस्त कार्यों की साधक है तथा सभी धर्मों का आश्रय है।
जो लोग आचार्य के इन स्पष्ट कथनों और सूत्रों को लोकस्मृति से मिटा देना चाहते हैं, वे ही चार्वाक को आन्वीक्षकी का अंग बताते हैं। स्पष्ट रूप से ऐसे लोग राक्षस हैं और नष्ट किये जाने योग्य हैं।

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