जीव-हत्या धर्म नहीं “जियो और जीने दो” ही सच्ची मानवता……….?
: धर्मेंद्र चौधरी (सामाजिक चिंतक) भारतवर्ष की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक परंपराएँ अपने भीतर गूढ़ विचार, नैतिक मूल्य और सामाजिक रीति-रिवाज लिए हुए हैं। बकरा ईद या ईद-उल-अजहा जैसे त्यौहार सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से समुदायों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। परंतु किसी भी परंपरा को अपनाने से पहले मानवता, करुणा और नैतिकता की कसौटी पर खरा […]
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