कौशल सिखौला वरिष्ठ पत्रकार

देश के तमाम हिल स्टेशंस पर नया साल मनाने के लिए सैलानियों की भीड़ उमड़नी शुरू !
महानगरों ही नहीं , छोटे बड़े शहरों में भी होटलों में बुकिंग शुरू !
अब सिर्फ युवा पीढ़ी नहीं , सभी पीढ़ियां मनाने लगी हैं नए साल का जश्न !
बड़े शहरों की सोसाइटीज में , मॉल्स में , होटलों में और फार्म हाउसों में होंगे बड़े बड़े कार्यक्रम !
फनकारों को मिलेगा अपनी फनकारी दिखाने और कमाने का मौका !
छोटे और मंझौले शहरों में भी नव वर्ष आयोजन !

अब अंग्रेजी कैलेंडर को विश्वव्यापी मान्यता मिल गई है तो फिर गिला कैसा ? हमारे ब्याह शादियों के कार्ड्स अंग्रेजी तारीखों से छपते हैं । बच्चों को स्कूल भेजना हो , ऑफिस जाना हो , छुट्टियां मनानी हों तो अंग्रेजी कैलेंडर ही चलेगा । बताइए कि ऐसा कौनसा कार्यक्रम है जो कार्ड पर तिथियां छाप कर प्रसारित किया जाता हो । हमारा परिवेश , पहनावा , रहन सहन सब पश्चिमी ही हो गया है । लोगों को वेतन पहली तारीख को मिलता है , प्रतिपदा या पूर्णिमा को नहीं ।

तब क्यों बेवजह कुछ लोग नए साल का विरोध करने खड़े हो जाते हैं ? पार्टियों में बाधा डालते हैं । ये लोग कभी नव संवत्सर धोती कुर्ता पहनकर मनाते हों ऐसा कभी नहीं देखा । लोग तो जींस पहनकर घाटों पर कर्मकांड कराते हैं । बस विरोध के लिए नया साल और वेलेंटाइन डे ही रह गया है क्या ? जहां तक सनातन मूल्यों के पुर्नस्थापन का सवाल है , हम उसके सबसे बड़े समर्थक हैं । भारतीय सिद्धांत विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं , इसमें कोई शक नहीं । लेकिन पहले अंग्रेजी कैलेंडर को समाप्त करने की घोषणा भारत सरकार से कराइए । क्या ऐसा कभी संभव है ?

यदि नहीं तो फिर नव वर्ष पर होने वाले विरोध वाले तमाशे रोकिए । नए साल का यह कंसेप्ट यदि सर्वमान्य है तो कुछ भी नया मनाने में क्या हर्ज है । यह दुनिया अब ग्लोबल हो चुकी है । तब तो बड़ा अच्छा लगता है जब व्हाइट हाउस में अमेरिकन राष्ट्रपति दिवाली मनाते हैं । पश्चिमी जगत के युवा जब वैदिक मंत्र बोलते हैं , तब और भी अच्छा लगता है । नए साल को लेकर जो बड़े बड़े प्रवचन करते हैं , उन्हें प्रोत्साहन मत दीजिए । नया साल है तो शुभकनाएं देने और लेने के लिए तैयार रहिए । हम भी तैयार हैं , आप भी रहिए ।