हरिद्वार। हमारे देश हिंदुस्तान में हाल में ही दशहरे का पर्व आ रहा है जिसमें रावण, मेघनाथ, कुंभकरण के पुतले का दहन किया जाता रहा है जबकि रावण को विद्वान, लंका पति ,शिव भक्त और अनेक विधाओं का ज्ञाता बताया गया है, इसके बावजूद रावण का दाह करने पर हरिद्वार के अरुण भदोरिया एडवोकेट, कमल भदोरिया एडवोकेट, सुमेधा भदोरिया एडवोकेट पत्नी श्री अनिरुद्ध प्रताप सिंह, चेतन भदोरिया LLB अध्यनरत और श्रीमती रेखा पांडे एडवोकेट पत्नी श्री ओमकार पांडे ने राज्य मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड देहरादून में गृह विभाग व संस्कृति विभाग उत्तराखंड शासन को व पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड व राज्य के समस्त जनपद जिला अधिकारी व राज्य के समस्त नगर निकाय व दशहरा आयोजन समिति को पक्षकार बनाते हुए एक याचिका दायर की है जिसमें यह जानकारी दी गई है कि रावण को केवल एक नकारात्मक पात्र के रूप में देखने की बजाय उसके विद्वत्तापूर्ण, धार्मिक साहित्य एवं सांस्कृतिक पक्षों का भी अध्ययन किया जाना चाहिए तथा समाज में इन पक्षों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की जानी चाहिए । भारतीय रामायण परंपरा में रावण को लंकापति परकांड विद्वान ,शिव भक्त तथा अन्य विधाओं का ज्ञाता बताया गया है विभिन्न धार्मिक एवं साहित्यिक परंपराओं में उसके व्यक्तित्व के अनेक पक्षों का वर्णन मिलता है ।रावण के व्यक्तित्व से संबंधित विद्वता ,तपस्या ,शिव भक्ति, संगीत तथा शास्त्रीय ज्ञान के उल्लेख इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं कि किसी भी पौराणिक पात्र का मूल्यांकन केवल एक ही पक्ष के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए ,रावण को परंपरागत रूप से वेदों एवं शास्त्रों का ज्ञाता ,संस्कृत का विद्वान, संगीत की जानकारी तथा भगवान शिव का अनन्य भक्त माना जाता है और उन्हीं के नाम से शिव तांडव स्तोत्र संस्कृत की भक्ति ,पारक काव्य परंपरा में विशेष स्थान रखता है रावण के नाम से विभिन्न धार्मिक ज्योतिसिय तथा आयुर्वेद संबंधी ग्रंथ परंपराएं प्रचलित हैं प्रत्येक ग्रंथ की वास्तविक रचना एवं ऐतिहासिक प्रमाणिकता का मूल्यांकन उसके स्वतंत्र स्रोतों के आधार पर किया जाना चाहिए क्योंकि विद्वान रावण की विद्वता, तपस्या एवं भगवान शिव के प्रति भक्ति, बाल्मीकि रामायण सहित विभिन्न रामायण परंपराओं में रावण की तपस्या शक्ति तथा भगवान ब्रह्मा से प्राप्त वरदानों का उल्लेख मिलता है रावण की शिव भक्ति ,भारतीय धार्मिक एवं साहित्यिक परंपरा में विशेष रूप से प्रसिद्ध है विद्वान रावण के संबंध में विद्वता, तपस्या ,शिव भक्ति, संगीत तथा राजकीय शक्ति जैसे पक्षों पर भी चर्चा की जानी चाहिए और समाज में यह संदेश दिया जाना चाहिए कि ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ सदाचार , विनम्रता ,न्याय ,स्त्री सम्मान एवं नैतिक आचरण भी आवश्यक है। सनातन धर्म में दशहरे के अवसर पर विद्वान रावण के पुतले के दहन के परंपरा देश की विभिन्न भागों में रावण ,मेघनाथ तथा कुंभकरण का दहन दहन किया जाता है ऐसे अवसर पर समाज को ज्ञान, विवेक, संयम, अहंकार ,त्याग ,स्त्री सम्मान तथा सदाचार जैसे मूल्यों की शिक्षा दी जा सकती है और विद्वान रावण के पुतले के दहन के स्थान पर अथवा उसके साथ-साथ ज्ञान विद्वता, नैतिकता साहित्य एवं सामाजिक सुधार पर आधारित कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जा सकता है रावण के पुतले को दहन को लेकर पर्यावरण एवं सार्वजनिक सुरक्षा के वैकल्पिक पहलू दशहरा आयोजनों में पुतला दहन के साथ कभी-कभी आतिशबाजी धवनी प्रदूषण, वायु प्रदूषण ,भीड़ प्रबंधन तथा अग्नि सुरक्षा से संबंधित प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं । राज्य मानवाधिकार आयोग का ध्यान अपनी याचिका में मांग करते हुए इस और भी आकर्षित किया है कि विद्वान शिव भक्त महा शक्तियों का सिद्धि रखने वाले रावण के पुतले को दहन ना किया जाए और ना दहन किया जाने के लिए किसी को प्रेरित किया जाए तथा रावण के विद्वता पूर्ण एवं साहित्यिक पक्षों पर संगोष्ठियों का आयोजन किया जाए रामायण की विभिन्न क्षेत्रीय साहित्यिक परंपराओं पर शैक्षिक कार्यक्रम किए जाएं, अहंकार ,अन्याय, हिंसा ,स्त्री असम्मान एवं अन्य सामाजिक बुराइयों के त्याग का संदेश देने वाले कार्यक्रम कराए जाएं ,संबंधित समुदाय ,धार्मिक संगठनों, विद्वानों एवं नागरिक समाज से परामर्श लेकर शांतिपूर्ण एवं वैकल्पिक उत्सवों को प्रोत्साहन किया जाए, सार्वजनिक आयोजनों में पर्यावरण एवं अग्नि सुरक्षा के नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए ,रावण से संबंधित साहित्यिक एवं धार्मिक परंपराओं के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित अध्ययन सामग्री तैयार कर कर जनता को उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों की जानकारी दी जाए ,उत्तराखंड राज्य सरकार के गृह विभाग और संस्कृति विभाग से इस विषय पर उनका पक्ष और उपलब्ध नीति संबंधी जानकारी प्राप्त करने पर विचार करने के लिए याचिका में मांग की गई है रावण जो की एक विद्वान भगवान शिव भक्त कई सिद्धियों को सिद्ध करने वाले रावण के पुतले को जलाए जाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हुए याचिका उत्तराखंड में दायर की गई है


