: धर्मेंद्र चौधरी (सामाजिक चिंतक)
उत्तराखण्ड की समस्याओं को यदि केवल कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से जोड़ा जाए तो हम बड़ी गलती कर रहे होंगे। यहाँ की सबसे बड़ी त्रासदी आज वह मानसिकता है जो बाहरी व्यक्ति को स्वयत्तः “खतरा” मानने लगती है। आर्थिक असुरक्षा, सांस्कृतिक भय और राजनीतिक उकसावे का मिश्रण जब किसी समाज में लंबे समय तक जमा होता है, तो वह क्षेत्रीय घृणा का पौधा उगने देता है। यही वह जड़ है जिससे आज उत्तराखण्ड के कुछ हिस्सों में कट्टर और आक्रामक “पहाड़वाद” जन्म ले रहा है, जो कई बार सामान्य पर्यटकों और बाहरी युवाओं के प्रति भी हिंसात्मक रूप धारण कर लेता है।
यहाँ दो बातें समझनी आवश्यक हैं। पहली, किसी संस्कृति और पहचान की रक्षा करना आवश्यक है। स्थानीय भाषा, रीति-रिवाज, परंपराएं और सामाजिक मर्यादा सम्मान के काबिल हैं। बाहरी लोगों द्वारा किसी स्थान की संवेदनशीलता का अपमान होना स्वीकार्य नहीं। दूसरी, किसी गलती या सामाजिक अपराध का उत्तर कैसे दिया जाना चाहिए यह वह प्रश्न है जो एक सभ्य समाज को परिभाषित करता है। क्या हिंसा उसका उत्तर हो सकता है? भीड़ की बर्बरता क्या न्याय है? बिलकुल नहीं।
दुनिया के हर पर्यटनस्थल के साथ कुछ सामाजिक समस्याएँ जुड़ी रहती हैं। कुछ पर्यटक लापरवाही दिखाते हैं, गंदगी फैलाते हैं, शराब के नशे में उत्पात करते हैं या स्थानीय संस्कृति का अनादर करते हैं। लेकिन सभ्य समाजों में इसका उपचार कानून और व्यवस्था के माध्यम से होता है जुर्माना, गिरफ्तारी, कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक शिक्षा। भीड़ और लाठी का उपयोग वहाँ न सिर्फ निन्दनीय है बल्कि असफल भी है; उसका उद्देश्य सुधार नहीं, केवल गुस्सा निकालना होता है। जबकि कानून का उद्देश्य अपराध को रोकना, दोषी को सजा देना और समाज को सुधारना है।
हाल में उत्तराखण्ड से आयी कुछ ऐसी ही घटनाओं ने देश को झकझोर दिया। जहाँ हरियाणा के युवाओं पर जिस तरह की बर्बरता हुई गाड़ी तोड़ना, नग्न करके पीटना उसका दर्द केवल पीड़ितों तक सीमित नहीं है। उन परिवारों की मानसिक दशा का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है जिनके बच्चे अपमान और भय का शिकार हुए। और सबसे दिल दहला देने वाली बात यह है कि जिस छेड़छाड़ के आरोप में ये हिंसा अंजाम दी गई, वहाँ पीड़िता की माँ ने स्वयं बयान देकर कहा कि बिना वजह की हिंसा हुई। यह बताता है कि मामला केवल अपराध से आगे जाकर सामाजिक बदसूरती और अवैध प्रतिशोध बन गया है।
जब समाज अपने भीतर जमा गुस्से, बेरोजगारी, असुरक्षा और पहचान के संकट को किसी दूसरे राज्य के लोगों पर उखाड़ने लगता है, तब वह धीरे-धीरे संवेदनहीन भीड़ में बदल जाता है। भीड़ का मानसिकता और कानून से अलग उद्देश्य होता है। भीड़ में लोग अपनी जिम्मेदारी और इंसानियत भूल जाते हैं। तब छोटे-छोटे आरोप भी कत्ल-ए-आदमी जैसा रूप ले लेते हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या हम न्याय चाहते हैं या केवल प्रतिशोध? क्या हम अपनी संस्कृति और गरिमा को कानून के बंधन में रहकर बचाना चाहते हैं या भीड़ के हाथों नदानी में दम घोंटकर?
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जिन राज्यों से सबसे अधिक पर्यटक आते हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और अन्य मैदानी इलाके वो ही उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार हैं। होटल, टैक्सी, ढाबे, होमस्टे, छोटे व्यापारी और स्थानीय कारीगर लाखों परिवारों का रोज़गार पर्यटन से जुड़ा हुआ है। यदि क्षेत्रीय घृणा और प्रतिशोध को बढ़ावा दिया जाएगा, तो उसका सबसे बुरा असर स्थानीय समाज पर ही पड़ेगा। पर्यटन घटेगा, आर्थिक अवसर कम होंगे और सामाजिक अविश्वास बढ़ेगा। डर और हिंसा कभी स्थायी सम्मान नहीं दिलाते; वे केवल बदनामी, आर्थिक पतन और सामाजिक अलगाव लाते हैं।
हिंसा कभी भी संस्कृति की रक्षा का माध्यम नहीं बन सकती। समाज के लिए असली चुनौती यह है कि वह अपने भीतर की असुरक्षा, विकृत सोच और कट्टरता को दूर कर सके। समाज तभी मजबूत रहता है जब वह कानून में विश्वास करता है, संवेदनशीलता बनाए रखता है और असहिष्णुता के बढ़ते स्वरूप का डटकर मुकाबला करता है। उत्तराखण्ड की पहचान उसकी सॉफ्ट पावर—उसकी प्राकृतिक सुंदरता, उसकी संस्कृति और उसकी मेहमाननवाज़ी में है, न कि किसी भी प्रकार के आक्रामक और अवैज्ञानिक ‘पहाड़वाद’ में।
हमें यह समझना होगा कि जिस दिन समाज कानून से ज्यादा गुस्से पर भरोसा करने लगेगा, उस दिन इंसान और भीड़ के बीच का फर्क खत्म हो जाएगा। और जब फर्क खत्म होगा, तो सभ्यता का आधार हिल जाएगा। इसलिए हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्तराखण्ड अपनी सांस्कृतिक गरिमा को बनाए रखते हुए कानून-व्यवस्था को मजबूत करे, स्थानीय लोगों की समस्याओं को समझे और पर्यटकों के लिए स्पष्ट नियम बनाए ताकि सुरक्षा, सम्मान और समृद्धि सबके लिए कायम रहे।

