उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण मतदाता और बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएँ

राजनीति राज्य

-जुगुल किशोर तिवारी बुन्देला 

उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण मतदाता परंपरागत रूप से किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी समर्थक नहीं माना जाता। अनेक लोगों का मानना है कि जब उसे कोई ईमानदार, निष्पक्ष और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने वाला विकल्प नहीं मिलता, तब वह उपलब्ध दलों में से किसी एक का समर्थन करता है। उसके मतदान व्यवहार में न्याय, सुशासन, कानून-व्यवस्था तथा राष्ट्र और धर्म से जुड़े मुद्दों को महत्वपूर्ण माना जाता है।

स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। उस दौर में ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समाज के बड़े वर्गों के समर्थन से कांग्रेस ने केंद्र और अनेक राज्यों में लंबे समय तक शासन किया। हालांकि आलोचकों का मत है कि कांग्रेस ने ऐसे कई निर्णय और नीतियाँ अपनाईं जिनसे सामाजिक समरसता प्रभावित हुई तथा कुछ वर्गों, विशेषकर सवर्ण समाज, में असंतोष उत्पन्न हुआ।

इसके बाद भारतीय जनता पार्टी एक ऐसे दल के रूप में उभरी जिसने स्वयं को राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों का समर्थक बताया। इसी कारण ब्राह्मण समाज के एक बड़े वर्ग ने भाजपा का समर्थन किया और उसे केंद्र तथा उत्तर प्रदेश में सत्ता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिर भी ब्राह्मण समाज का मतदान किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा। यदि वह जातिवादी दृष्टिकोण अपनाता, तो अन्य कुछ जातीय समूहों की तरह किसी एक दल का स्थायी मतदाता बन सकता था, किंतु उसके मतदान का इतिहास सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्ति भी दर्शाता है।

समाजवादी पार्टी के शासनकाल में कानून-व्यवस्था, अपराध और दबंगई को लेकर व्यापक आलोचना हुई। ऐसे वातावरण में ब्राह्मण समाज के एक हिस्से ने बहुजन समाज पार्टी का समर्थन किया और मायावती के नेतृत्व में सरकार बनी। अनेक विश्लेषकों का मत है कि उस सरकार के दौरान कानून-व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर रही, यद्यपि भ्रष्टाचार के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे।

इसी प्रकार यह भी आरोप लगाए गए कि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने कार्यकाल में जातीय पक्षपात किया, जिससे ब्राह्मण समाज में असंतोष बढ़ा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर यह अपेक्षा की गई कि पूर्व की कमियों में सुधार होगा। यद्यपि अखिलेश यादव के नेतृत्व में सुधार के प्रयासों की चर्चा हुई, लेकिन भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं तथा कानून-व्यवस्था को लेकर उठते प्रश्नों के कारण ब्राह्मण समाज का एक वर्ग पुनः उससे दूर होता गया और भाजपा की ओर आकर्षित हुआ।

वर्तमान में भाजपा के दो कार्यकालों के बाद भी ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में असंतोष देखने को मिलता है। आलोचकों द्वारा ब्राह्मणों के विरुद्ध अपराध, पुलिस कार्रवाई, प्रशासनिक व्यवहार, एससी/एसटी अधिनियम में संशोधनों, यूजीसी विनियमों तथा अन्य सरकारी नीतियों को लेकर प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। साथ ही कुछ धार्मिक और प्रशासनिक विवादों ने भी इस वर्ग के एक हिस्से में निराशा उत्पन्न की है। इन कारणों से अनेक लोग अब एक नए राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं।

ऐसी चर्चा केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान सहित कई राज्यों में समय-समय पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और समूहों द्वारा आंदोलन एवं विरोध-प्रदर्शन हुए हैं, जिन्हें कुछ लोग इस बदलते राजनीतिक मनोविज्ञान का संकेत मानते हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था की दृष्टि से यह भी एक विचार है कि सत्ता का समय-समय पर परिवर्तन लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाता है। जब कोई दल लंबे समय तक सत्ता में रहता है, तो उसके प्रति जन-असंतोष बढ़ने की संभावना रहती है। स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में यह प्रवृत्ति कई बार देखने को मिली है कि पहले कार्यकाल में जनता की अपेक्षाएँ बढ़ती हैं, जबकि बाद के कार्यकालों में सरकारों को अपनी नीतियों और कार्यशैली के कारण अधिक आलोचना का सामना करना पड़ता है।

अंततः उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण मतदाता केवल जातीय आधार पर नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता, न्याय, कानून-व्यवस्था, राष्ट्रहित, धार्मिक आस्था, प्रशासनिक निष्पक्षता और उपलब्ध राजनीतिक विकल्पों का मूल्यांकन करके अपना निर्णय लेने का प्रयास करता है। भविष्य में यदि कोई दल या गठबंधन इन अपेक्षाओं पर अधिक प्रभावी ढंग से खरा उतरता है, तो उसके पक्ष में राजनीतिक समर्थन का नया समीकरण बन सकता है।

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