जीव-हत्या धर्म नहीं “जियो और जीने दो” ही सच्ची मानवता……….?

धर्म राष्ट्रीय

: धर्मेंद्र चौधरी (सामाजिक चिंतक)

भारतवर्ष की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक परंपराएँ अपने भीतर गूढ़ विचार, नैतिक मूल्य और सामाजिक रीति-रिवाज लिए हुए हैं। बकरा ईद या ईद-उल-अजहा जैसे त्यौहार सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से समुदायों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। परंतु किसी भी परंपरा को अपनाने से पहले मानवता, करुणा और नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरना अत्यावश्यक है। इस दृष्टि से कहना चाहिए कि किसी भी मूक जीव की तड़पा-तड़पाकर हत्या करना किसी भी प्रकार से धार्मिक कृत्य नहीं हो सकता। जियो और जीने दो यही सच्ची मानवता और धर्म का मार्ग है।

पहला बिंदु धर्म का मूल उद्देश्‍य करुणा है। समस्त प्रमुख धर्मों के मूल सन्देश में अहिंसा, करुणा और परस्पर सद्भाव का स्थान सर्वोपरि है। वेद, उपनिषद, बायबिल, कुरआन तथ्यों में परस्पर भिन्नता के बावजूद करुणा और इंसानियत का संदेश मिलता है। जब धर्म का वास्तविक भाव करुणा है, तब किसी मूक जीव की तड़पकर हत्या कर उसे धार्मिक कर्म बताना उस मूल भाव के विरुद्ध है। धार्मिकोक्ति तब अर्थहीन हो जाती है जब वह क्रूरता को धार्मिकता का रंग दे दे।

दूसरा बिंदु जीवों का भी जीवन-मूल्य। प्राणी-जगत में पशु, पक्षी और अन्य जीवों की संवेदना, दर्द और भय का अनुभव शोधों से भी साबित हुआ है। जीव केवल शारीरिक क्रियाएँ नहीं करते; वे दर्द महसूस करते हैं, पीड़ा सहते हैं और मृत्यु के भय से छटपटा सकते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी किसी मूक जीव की हत्या को मामूली समझना नाइंसाफी है। मानव संवेदना तभी महान बनती है जब वह कमजोरों की रक्षा करे। इसलिए जीव-हत्या को धर्म से जोड़ना न केवल अनैतिक है, बल्कि बुनियादी संवेदनशून्यता का परिचायक भी है।

तीसरा बिंदु धार्मिक कर्म और नैतिक दायित्व का समीकरण। धर्म केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि मूल्य और आचरण भी है। यदि कोई कर्म अनैतिक परिणाम पैदा करता हैदुख, क्रूरता, अत्याचारतो उसे धर्म कहकर पुष्ट करना अनुचित है। जीव-हत्या से जुड़े अनुष्ठानिक पक्ष को पुनर्विचार की आवश्यकता है। धार्मिक भाव के नाम पर होने वाले अत्याचारों का सहारा लेकर नैतिकता की सीमाओं को पार नहीं किया जा सकता। असल धर्म वह है जो जीवन का सम्मान कराए, न कि जिसे जीवन का हनन छिपकर किया जाए।

चौथा बिंदु सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय पहलू। बड़े पैमाने पर जानवरों की कुर्बानी से संसाधनों की बर्बादी भी होती है—खाद्य अपव्यय, गंदगी, और सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्याएँ जन्म ले सकती हैं। कई बार मांस व्याप्ति के कारण सामाजिक तनाव और पाश्चात्य प्रतिक्रियाएँ भी देखने को मिलती हैं। इसके अलावा, पशु-पालन के तरीकों में क्रूरता और औद्योगीकरण के कारण पारिस्थितिकी पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। धर्म का असली अर्थ समाज और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना भी है।

पांचवां बिंदु वैकल्पिक और सहृदय विकल्प मौजूद हैं। यदि त्यौहार मनाना है तो उसे करुणा और परोपकार के साथ जोड़ा जा सकता है—भोजन का वितरण, गरीबों की सहायता, या आवश्यकताओं के अनुरूप दान। धार्मिक भाव को बढ़ावा देने के लिए हिंसा का सहारा लेना अनावश्यक है। अनेक धर्मगुरु, विचारक और समाजसेवी यह सुझाते आए हैं कि त्योहारी अवसरों पर अहिंसात्मक प्रयोग करें—वैकल्पिक अनुष्ठान, सिंवलिक बलिदान या दान-धर्म को प्राथमिकता दें। इससे धर्म का मूल भाव भी बना रहेगा और क्रूरता का स्थान नहीं होगा।

छठा बिंदु कानून, नीति और नागरिक चेतना। कुछ देशों और समुदायों में कुर्बानी को नियंत्रित करने वाले नियम हैं, ताकि पशुओं का दर्द कम से कम हो। सार्वजनिक जागरूकता, पशु-कल्याण कानूनों का कड़ाई से पालन और नागरिकों की संवेदनशीलता बढ़ाकर हम इस संस्कृति में परिवर्तन ला सकते हैं। नागरिकों को जानवरों के प्रति सहानुभूति और वंदनीय व्यवहार अपनाना चाहिए; धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब हिंसा का समर्थन नहीं हो सकता। जियो और जीने दो यह सिद्धांत हर नागरिक के लिए मार्गदर्शक होना चाहिए।

सातवां बिंदु शिक्षा और नैतिक पुनरुत्थान। बच्चों और युवा पीढ़ी को नैतिकता, करुणा और सहिष्णुता की शिक्षा देकर ही हम दीर्घकालिक परिवर्तन ला सकते हैं। जब समाज के प्रत्येक सदस्य यह समझेगा कि जीवों का जीवन सम्माननीय है, तो वे परंपराओं का अवलोकन भी नई दृष्टि से करेंगे। धार्मिक शिक्षा में प्रेम और दया का समावेश बढ़ाना जरूरी है, ताकि अनावश्यक हिंसा के रूप में प्रचलित प्रथाएँ समाप्त हों।

आठवां बिंदु व्यक्तिगत स्तर पर निर्णय। किसी भी अनुष्ठान या परंपरा को अपनाने से पहले व्यक्तिगत विवेक काम आता है। यदि किसी व्यक्ति का विश्वास कहता है कि कुर्बानी आवश्यक है, तो उसे यह विचार करना चाहिए कि क्या वह सचमुच किसी की तड़प-तड़पाकर हत्या को उचित मानता है। क्या यही धार्मिक संदेश है जिसे वह अपने जीवन और समाज में फैलाना चाहता है? विवेकशील निर्णय और सहृदय दृष्टिकोण ही हमें मानवता के पथ पर आगे ले जाते हैं।

किसी भी मूक जीव की तड़पा-तड़पाकर हत्या धर्म नहीं हो सकती। यह क्रूरता है, और इसे धर्म का आवरण पहनाकर मान लेना मानवता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। “जियो और जीने दो” यह सत्य और सच्ची धार्मिकता का मार्ग है। धर्म का सार करुणा और सहिष्णुता है; यदि परंपराएँ इन मूल्यों से भिड़ती हैं, तो उन्हें बदलने या परिष्कृत करने की आवश्यकता है। समाज में संवेदना जगाकर, वैकल्पिक प्रथाओं को अपनाकर और शिक्षा के माध्यम से हम एक ऐसे परिदृश्य की ओर बढ़ सकते हैं जहाँ त्यौहार प्रेम, दया और साझा खुशी का कारण हों, न कि किसी की तड़प-तड़पकर मृत्यु का बहाना।

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