हिंदू सचमुच खतरे में है, पर खतरा बाहर नहीं, हमारे भीतर पल रही भीड़ है

अपराध राष्ट्रीय

धर्मेन्द्र चौधरी (सामाजिक चिंतक)

सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेज़ी से फैल रहा है, जो कथित तौर पर बिहार के जमुई से जुड़ा बताया जा रहा है। रात के सन्नाटे में एक नाबालिग युवक-युवती सुनसान जगह पर खड़े थे, तभी कुछ लड़कों की भीड़ वहां पहुंचती है और दोनों को घेर लेती है। भीड़ में से एक लड़का लड़की को पीछे से पकड़कर जबरन खींचने लगता है, लड़की घबराई हुई खुद को छुड़ाने की कोशिश करती है और इस पूरे दृश्य के दौरान आसपास खड़े बाकी लोग उसे बचाने के बजाय मोबाइल निकालकर वीडियो बनाते रहते हैं। बड़ी मुश्किल से साथ मौजूद युवक उसे छुड़ाता है, और दोनों बाइक पर बैठकर वहां से निकल जाते हैं।

यह दृश्य जितना डरावना है, उतना ही यह सवाल भी झकझोरने वाला है किसने इन लोगों को “सामाजिक पुलिसिंग” के नाम पर किसी की गरिमा और सुरक्षा से खिलवाड़ करने का अधिकार दे दिया?

हमारे समाज में, विशेषकर उस समाज में जो खुद को संस्कारों और परंपराओं का रक्षक मानता है, यह प्रवृत्ति कहीं ज़्यादा खतरनाक होती जा रही है। कोई कानून, कोई अदालत, कोई पुलिस इन स्वघोषित “रखवालों” को यह अधिकार नहीं देती कि वे रात के अंधेरे में किसी लड़की को घेरकर, डराकर, अपने हिसाब से “सज़ा” तय करें। जो लोग खुद को समाज और धर्म का पहरेदार समझते हैं, वे भूल जाते हैं कि असली संस्कार डर पैदा करने में नहीं, बल्कि सुरक्षा और सम्मान देने में हैं।

और उतना ही चिंताजनक है वह भीड़ जो घटना को रोकने के बजाय कैमरा उठाकर तमाशबीन बन जाती है। यह सिर्फ एक लड़की के साथ हुए अन्याय की कहानी नहीं है यह हमारी सामूहिक चेतना के मर जाने की कहानी है। जब कोई समाज संवेदनशीलता खो देता है और क्रूरता का मूकदर्शक बन जाता है, तो वह समाज भीतर से खोखला होने लगता है।

असल में “हिंदू खतरे में है” का नारा अक्सर बाहरी शत्रु की तस्वीर दिखाकर उछाला जाता है, लेकिन सच यह है कि असली खतरा हमारे भीतर पल रही वह मानसिकता है, जो नैतिकता के नाम पर हिंसा को जायज़ ठहराती है। जब युवाओं को प्रेम करने, बात करने, साथ चलने तक के लिए भीड़ के डर में जीना पड़े, तो यह किसी और धर्म या समुदाय का खतरा नहीं यह हमारी अपनी सोच का पतन है।

समाज को अब आत्ममंथन करने की ज़रूरत है। कानून अपना काम करे, प्रशासन ऐसी भीड़ पर सख्ती से नकेल कसे, और सबसे ज़रूरी हर नागरिक यह समझे कि किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना “संस्कार” नहीं, अपराध है।

यदि हम आज इस प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो कल यही भीड़ हमारे अपने घर की बेटियों तक पहुंच सकती है। इसलिए सतर्क रहना, सवाल पूछना और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना ही असली सामाजिक और सांस्कृतिक रक्षा है।

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