•धर्मेन्द्र चौधरी (सामाजिक चिंतक)
किसी अपने की मृत्यु के बाद इंसान टूट जाता है। यह वाक्य केवल शब्द नहीं, बल्कि उस गहन पीड़ा का प्रतीक है जो हृदय को चीर देती है। हिंदू रीति-रिवाजों में मृत्यु को केवल शरीर का अंत नहीं माना जाता, अपितु आत्मा की यात्रा का प्रारंभ। इसलिए तेरह दिनों तक शोक का पालन अनिवार्य है। पिंडदान, श्राद्ध, ब्रह्मभोज और परिवार की सामूहिक उदासी। हमारे क्षेत्रों में तो यह शोक उस वर्ष की होली तक विस्तारित हो जाता है। कोई शुभ कार्य नहीं, न विवाह, न गृहप्रवेश। यह परंपरा हमें सिखाती है कि मृत्यु एक रस्म नहीं, परिवार के जीवन में स्थायी खालीपन है। लोग महीनों तक सामान्य नहीं हो पाते। हँसना भारी लगता है, बोलना बोझिल, भोजन नीरस। यह वह समय है जब रिश्ते मजबूत होते हैं, संवेदना का आदान-प्रदान होता है।
लेकिन आज का दौर देखिए। एक ऐसी घटना घटी, जो समाज के अंतस को झकझोर गई। पति की मृत्यु के मात्र तीन दिन बाद, अंतिम संस्कार के दो दिन बाद ही उपमुख्यमंत्री पद की शपथ! यह सवाल किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरी राजनीति और समाज से है। क्या पद इतना बड़ा हो गया कि शोक, संवेदना और रिश्ते छोटे पड़ गए? यह घटना महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री इरावती देवरकर से जुड़ी है, जिनके पति का देहांत होते ही उन्होंने सत्ता का दायित्व संभाल लिया। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई क्या यह असंवेदनशीलता है या कर्तव्यनिष्ठा? लेकिन सच्चाई तो यही है कि यह हमारे समय की कड़वी तस्वीर है।
हिंदू धर्मग्रंथों में शोक का महत्व असीम है। गरुड़ पुराण कहता है कि मृत्यु के बाद आत्मा को पितृलोक की यात्रा करनी होती है, जिसमें परिवार की प्रार्थनाएँ सहायक बनती हैं। मनुस्मृति में वर्णित है कि शोक काल में शुभ कार्य निषिद्ध हैं, ताकि जीव की मुक्ति हो सके। उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा कठोरता से पाली जाती है। मेरे शहर मेरठ में भी, किसी की मृत्यु पर घर पर सफेद चादरें बिछ जाती हैं, मूर्तियाँ ढक दी जाती हैं, और पूरे वर्ष कोई उत्सव नहीं। यह केवल रिवाज नहीं, भावनात्मक उपचार है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी शोक प्रसंस्करण आवश्यक है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एलिजाबेथ कुब्लर-रॉस ने शोक के पाँच चरण बताए इनकार, क्रोध, सौदेबाजी, अवसाद और स्वीकृति। तीन दिन में स्वीकृति असंभव है। अध्ययनों से सिद्ध है कि अचानक शोक में लोग वर्षों तक अवसादग्रस्त रहते हैं। फिर राजनीतिक पद के लिए यह जल्दबाजी क्यों?
राजनीति का यह स्वरूप दुखद है। पद और पैसे के लोभ ने इंसानियत को गिरवी रख दिया। प्राचीन काल में राजा भी शोक मानते थे। महाभारत में पांडवों ने कौरवों की मृत्यु पर वर्षों शोक किया। चाणक्य नीति कहती है, “राजनीति में भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, किंतु कर्तव्य प्रधान।” लेकिन आज कर्तव्य का अर्थ सत्ता प्राप्ति हो गया है। भारत में ऐसे उदाहरण विपुल हैं। 2019 में ज्योति बस्सी की मृत्यु के बाद उनके पति ने तुरंत चुनाव लड़ा। उत्तर प्रदेश में विधायकों की मृत्यु पर उपचुनाव तुरंत होते हैं। क्या यह परंपरा का अपमान नहीं? संविधान अनुच्छेद 75(3) कहता है कि मंत्री परिषद प्रधानमंत्री पर सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, किंतु शोक काल का कोई प्रावधान नहीं। लेकिन नैतिकता कहाँ बची है?
समाज भी इसमें साझीदार है। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग होती है “शोक में पद त्याग दो!” लेकिन वही समाज वोट के लिए जाति-पंथ देखता है। महात्मा गांधी ने कहा था, “राजनीति सेवा है, सत्ता नहीं।” आज सत्ता ही सब कुछ है। महिलाओं के लिए यह दोहरा मापदंड है। यदि पुरुष करता, तो “कर्तव्यपरायण” कहते, स्त्री पर “लोभी”। यह पितृसत्तात्मक मानसिकता समाज को खोखला कर रही है। उत्तराखंड और हरिद्वार जैसे धार्मिक क्षेत्रों में शोक परंपराएँ जीवंत हैं, किंतु राजनीति इन्हें नकार रही है। मानवीय संवेदना आवश्यक है, पर सत्ता का खेल भावनाओं को कुचल देता है।
इस घटना से बड़ा प्रश्न उठता है।क्या हमारी राजनीति इतनी नीचे गिर चुकी है कि रिश्ते बोझ बन गए? पद के लिए भावनाएँ गिरवी रखना मानवीय मूल्यों का हनन है। हमें आवश्यकता है नैतिक पुनरुत्थान की। राजनीतिक दलों को शोक अवकाश का नियम बनाना चाहिए। समाज को संवेदनशील बनना चाहिए। अन्यथा यह खालीपन स्थायी हो जाएगा। मृत्यु सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है, सत्ता नहीं। आइए, इस कड़वी तस्वीर को बदलें। शोक को सम्मान दें।

