हरिद्वार, 15 अक्टूबर।
अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रतिनिधि डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि नवरात्रि आत्मचिंतन, आत्मपरिष्कार और आंतरिक शक्तियों के जागरण का विशेष अवसर है। श्रद्धा, मनोयोग और समर्पण के साथ की गई साधना व्यक्ति के विचारों, व्यवहार और व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन लाकर उसे उत्कृष्ट जीवन की दिशा में अग्रसर करती है।
देव संस्कृति विश्वविद्यालय के उपाध्यक्ष डॉ. पण्ड्या गायत्री तीर्थ शांतिकुंज के मुख्य सभागार में ‘कर रहे हैं हम साधना’ विषय पर आयोजित सत्संग सभा को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर शांतिकुंज के अंतेवासी कार्यकर्ता भाई-बहनों सहित देश-विदेश से आए एक हजार से अधिक पीतवस्त्रधारी श्रद्धालु एवं साधक उपस्थित रहे।
डॉ. पण्ड्या ने कहा कि शांतिकुंज युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा की तप-साधना से पवित्र हुई भूमि है। यहाँ साधना का अवसर प्राप्त होना स्वयं में सौभाग्य का विषय है। उन्होंने नौ शब्दों और 24 अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र को वर्तमान युग की समस्याओं के समाधान का आध्यात्मिक आधार बताते हुए कहा कि पूज्य गुरुदेव के चिंतन में व्यक्ति, समाज और समूची मानवता के उत्थान की व्यापक संभावनाएँ निहित हैं। उन्होंने कहा कि नवरात्रि साधना आंतरिक उत्कृष्टता और चरित्र निर्माण की सशक्त प्रक्रिया है। साधना की पहली शर्त निष्पक्ष आत्मसमीक्षा है। अपने गुणों का संवर्धन और अवगुणों का परिमार्जन ही वास्तविक आत्मनिर्माण है। जब व्यक्ति के विचारों में उत्कृष्टता और चरित्र में प्रखरता आती है, तब उसका सकारात्मक प्रभाव समाज पर भी पड़ता है। शांतिकुंज को कल्पवृक्ष के समान बताते हुए डॉ. पण्ड्या ने कहा कि यहाँ श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई साधना जीवन को नई दिशा प्रदान करती है। उन्होंने गुरु की महिमा पर प्रकाश डालते हुए साधकों से प्रखर प्रज्ञा, सजल श्रद्धा और पूज्य गुरुदेव के आदर्शों को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।
इससे पूर्व शांतिकुंज के संगीत विभाग के कार्यकर्ताओं ने सुमधुर प्रेरणाप्रद गीतों की प्रस्तुति दी। वहीं साधकों ने ध्यान, हवन एवं अन्य आध्यात्मिक गतिविधियों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की।


