पत्रकारिता केवल कॉपी-पेस्ट का एक सस्ता और आसान कारोबार?

राष्ट्रीय

 -राजेन्द्र सिंह जादौन

पत्रकारिता या कॉपी-पेस्ट का कारोबार?
आज का दौर ऐसा बन चुका है कि हर गली, हर मोहल्ले और हर चौराहे पर एक “पत्रकार” मिल जाता है। हाथ में मोबाइल, जेब में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर एक पेज बस, पत्रकारिता शुरू।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सच में पत्रकारिता है, या केवल कॉपी-पेस्ट का एक सस्ता और आसान कारोबार?

पत्रकारों की नई “प्रजातियां”
आज पत्रकारिता के नाम पर कुछ नई प्रवृत्तियां तेजी से उभर रही हैं।
पहली श्रेणी पेस्टबाज पत्रकार
इनका काम बेहद आसान होता है। जहां भी कोई खबर दिखी, उसे उठाया और बिना किसी जांच-पड़ताल के अपने प्लेटफॉर्म पर डाल दिया। न तथ्यों की पुष्टि, न भाषा की शुद्धता और न ही जिम्मेदारी का एहसास। सच या झूठ बस खबर चलनी चाहिए।
दूसरी श्रेणी कॉपी करने में माहिर पत्रकार
ये एक कदम आगे होते हैं। दूसरों की मेहनत को अपने नाम से प्रकाशित करना इनकी आदत बन चुकी है। किसी की खोजी रिपोर्ट, किसी का विश्लेषण सब इनके लिए सिर्फ “कंटेंट” है, जिसे अपने नाम से प्रस्तुत कर दिया जाता है।
तीसरी श्रेणी जुगाड़ू पत्रकार
ये खुद को थोड़ा “क्रिएटिव” समझते हैं। खबर को कॉपी करते हैं, हेडिंग बदलते हैं, कुछ शब्द इधर-उधर करते हैं और उसे नया रूप देने का भ्रम पाल लेते हैं। लेकिन सच यह है कि यह मौलिकता नहीं, बल्कि नकल की सजावट है।

पत्रकारिता जिम्मेदारी, न कि शॉर्टकट
अब सवाल यह है कि जब इतना दिमाग कॉपी-पेस्ट और जुगाड़ में लगाया जा सकता है, तो क्यों न उसी ऊर्जा को अपनी सोच विकसित करने में लगाया जाए?
क्यों न अपनी लेखनी को मजबूत किया जाए?
क्यों न अपनी पहचान खुद के दम पर बनाई जाए?
पत्रकारिता केवल खबर लिखना नहीं है, यह समाज के प्रति एक गंभीर जिम्मेदारी है।
एक सच्चा पत्रकार वही होता है जो सत्ता से सवाल करता है, सच्चाई को सामने लाने का साहस रखता है और जनता की आवाज बनता है।
लेकिन जब पत्रकार ही दूसरों की मेहनत पर निर्भर हो जाए, तो वह समाज को क्या दिशा देगा?

मौलिकता ही असली पहचान है
आज जरूरत है आत्ममंथन की। यह समझने की कि पत्रकारिता कोई शॉर्टकट नहीं, बल्कि एक साधना है। इसमें निरंतर अभ्यास, धैर्य और ईमानदारी की जरूरत होती है।
“करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” यह केवल कहावत नहीं, बल्कि सच्चाई है।
छोटी शुरुआत कीजिए, लेकिन अपनी कीजिए। गलतियां होंगी, पर वही आपको बेहतर बनाएंगी।
किसी की नकल करके कभी भी अपनी पहचान नहीं बनाई जा सकती।
अगर आप किसी का लिखा साझा करते भी हैं, तो उसका श्रेय अवश्य दीजिए। यह केवल नैतिकता नहीं, बल्कि उस लेखक के प्रति सम्मान भी है।

आत्ममंथन का समय
आज पत्रकारिता के स्तर पर सवाल उठते हैं, लेकिन इसकी जिम्मेदारी भी हम सभी पर है।
जब तक हम खुद को नहीं बदलेंगे, तब तक हालात नहीं बदलेंगे।
इसलिए, खुद से पूछिए
क्या आप वास्तव में पत्रकार हैं, या केवल खबरों के व्यापारी?
यदि आप पत्रकार हैं, तो अपनी कलम को ईमानदार बनाइए, विवेक को जागृत रखिए और बुद्धि का सही उपयोग कीजिए।
क्योंकि एक सच्चे पत्रकार की पहचान उसकी मौलिकता से होती है, न कि उसकी कॉपी-पेस्ट की गति से।
याद रखिए भीड़ में शामिल होना आसान है, लेकिन अलग पहचान बनाना कठिन।
और वही कठिन रास्ता आपको एक सच्चा पत्रकार बनाता है।

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