भारत का स्वरूप केवल भौतिक विकास से परिभाषित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसकी आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा, वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और व्याकरण ही इसकी आत्मा है: शतपथी

उत्तराखंड हरिद्वार

बहादराबाद, हरिद्वार। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय एवं साहित्य अकादमी नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से आये संस्कृत के युवा लेखकों ने अपनी रचनाओं और शोध पत्रों के वाचन का अद्भुत प्रदर्शन कर सभी का मन मोह लिया। ‘विकसित भारत के निर्माण में संस्कृत के युवा लेखकों का योगदान’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक गैरोला ने कहा कि प्रदेश में संस्कृत के व्यापक प्रसार के लिए ठोस कार्ययोजना बनाई गई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2030 तक राज्य के सभी 95 ब्लॉकों में एक-एक संस्कृत ग्राम स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तिरुपति के पूर्व कुलपति डॉ हरेकृष्ण शत पथी ने विषय उपस्थापन करते हुए कहा कि वर्तमान काल में भारत देश विकास की नई दिशा में अग्रसर हो रहा है। इस महान राष्ट्र-निर्माण कार्य में विशेष रूप से युवा लेखकों की बड़ी भागीदारी है, जब बात संस्कृत के युवा लेखकों की आती है तो यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं है, बल्कि यह विचारों, संस्कारों और ज्ञान-परंपरा का वाहक होता है।
भारत का स्वरूप केवल भौतिक विकास से परिभाषित नहीं किया जा सकता, बल्कि इसकी आध्यात्मिक ज्ञान-परंपरा, वेद, उपनिषद, संस्कृत साहित्य और व्याकरण ही इसकी आत्मा है।
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ राधावल्लभ त्रिपाठी ने युवा लेखकों की संगोष्ठी को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और प्राकृतिक बुद्धिमत्ता (NI) के बीच समन्वय आवश्यक है। AI वह यांत्रिक ज्ञान है, जो तेज़ गणना और विश्लेषण करता है, जबकि NI मानव के भीतर स्थित विवेक, संस्कार और नैतिकता है, जो भारतीय परंपरा का मूल है। यदि AI बुद्धि प्रदान करता है, तो NI उसे सही दिशा देता है।
युवा लेखक इन दोनों का संतुलित समन्वय करके नए भारत की रूपरेखा तैयार कर सकते हैं। पद्मश्री डॉ अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने कहा कि संस्कृत साहित्य की गहराई, वेदों के सार्वभौमिक संदेश और आधुनिक विज्ञान के नवाचार को मिलाकर प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। प्राचीन ज्ञान की तुलना में आधुनिक ज्ञान अधिकतर भौतिक विकास पर केंद्रित है, जबकि प्राचीन भारतीय ज्ञान आत्म-विकास, सामाजिक समन्वय और प्रकृति के संतुलन पर आधारित था, इसलिए इन दोनों के समन्वय से ही सच्चा “विकसित भारत” साकार होगा। कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पांडेय ने अपने विचार युवा लेखकों से साझा करते हुए कहा कि
यदि युवा शक्ति अपने लेखन के माध्यम से राष्ट्र में जागरूकता, नैतिकता और नए विचारों का प्रसार करेगी, तो आने वाले बीस वर्षों में भारत पूर्ण रूप से एक विकसित राष्ट्र बन जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
कार्यक्रम में स्वागत भाषण डॉ हरीश तिवाड़ी ने तथा संचालन डॉक्टर प्रकाश पंत ने किया। कार्यक्रम में प्रख्यात महिला फोटो ग्राफर वात्सल्या त्रिवेदी, प्रोफेसर मोहन चंद्र बलोदी,प्रोफेसर अरविन्द नारायण मिश्रा, प्रोफेसर राम खण्डेलवाल, प्रोफेसर बिन्दुमती द्विवेदी, प्रोफेसर दामोदर परगाई,प्रोफेसर मनोज किशोर पन्त,डॉ कामाख्या कुमार,डॉ कंचन तिवारी,डॉ अजय परमार, डॉ विनय सेठी,डॉ सुमन भट्ट,सुशील चमोली सहित अनेक लोग उपस्थित रहे।

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