केदार से कल्प केदार नहीं जागी सरकार, धराली का बदला इतिहास और भूगोल

उत्तराखंड

:डॉ बृजेश सती, वरिष्ठ पत्रकार 

पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हालिया वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में तेजी आईं है। खासतौर से बादल फटने की घटनाएँ लगातार चिंता का विषय बनती जा रही हैं। विशेषरूप से मानसून के दौरान अतिवृष्टि के कारण न केवल जन-धन की हानि हो रही है। बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन और जलवायु परिवर्तन के खतरों की भी गंभीर चेतावनी दे रहा है। केदारनाथ से कल्प केदार तक की घटनाओं का सरकारों ने संज्ञान लिया होता तो शायद ये भयावह मंजर नहीं होता।

मंगलवार को उत्तरकाशी जिले के धराली में खीर गंगा में बादल फटने के बाद आए मालवे ने धराली कस्बे का का इतिहास और भूगोल बदल दिया।
प्राकृतिक आपदाएं पहाड़ के लिए नई नहीं है। आए दिन पहाड़ में बादल फटने की घटनाएं सामने आ रही है। खास तौर से पिछले एक दशक से इस तरह की घटनाएं बड़ी तेजी से पहाड़ों में घटित हो रही हैं। गंगा घाटी में धराली और सुखी टॉप में मंगलवार को हुई घटनाएं इसी की कड़ी का एक हिस्सा है। दरअसल विध्वंसात्मक विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियोजित निर्माण किया जा रहा है । जिसका नतीजा बड़ी जन धन की हानि के रूप में हमारे सामने आ रहा है । इसको लेकर वैज्ञानिक भी चिंतित हैं। हालांकि समय-समय पर उनकी ओर से इस बात को अलग-अलग स्तर पर रखा जाता रहा है। लेकिन इस सबकी अनदेखी कर बड़े स्तर पर पहाड़ों में नदियों, गाड़, गडरों के मुहाने पर बड़े स्तर पर निर्माण कार्य किए गए हैं। जिससे इनका पारंपरिक मार्ग अवरुद्ध हो गया है और उसी का नतीजा इस तरह की घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है।
इससे पहले 7 फरवरी 2021 को ज्योतिर्मठ विकास खण्ड के इसी तरह के जल प्रलय में 206 लोगों की मौत हो गई। यह घटना जनपद चमोली में उस स्थान पर हुई, जहां कभी गौरा देवी ने 70 के दशक में चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी।
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट के मुताबिक उत्तरकाशी जिले के हर्षिल से तीन किलोमीटर आगे गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर धराली गाँव अतिवृष्टि के चलते गाँव का भूगोल बदल गया है। यह घाटी समय-समय पर इस प्रकार की घटनाओं की साक्षी रही है। वो बताते हैं कि सन 1750 और सन 1803 में इस घाटी में घटना हो चुकी है। गंगोत्री नदी में झाला के पास अवांणा का डाण्डा से अतिवृष्टि के चलते पहाड़ी मालवे ने सुखी गाँव के नीचे भागीरथी गंगा के प्रवाह को रोक दिया था। इससे लगभग 14 किलोमीटर झील झाला से जांगला तक बनी। इसमें तीन गाँव पूरी तरह समाहित हो गए थे। नतीजन आज हमे यह घाटी बहुत चौड़ी नजर आती है।
प्रो बिष्ट कहते हैं कि दुर्भाग्य से हमारी आने वाली पीढ़ी ने उस विभीषिका से सबक नहीं लिया। आज जगह जगह हर नालों के मुहाने पर बड़े बड़े होटल बस्तियों की बसावट हो चुकी है। फिर यही दुःखद समाचार देखने को मिलता है।
स्थानीय जानकारी लोगों के मुताबिक पिछले डेट दशक के दौरान नाले ने कई बार अपना विकराल रूप दिखाया है।

# पिछले ढाई दशक में अलग-अलग स्थान पर हुई घटनाएं
पिछले 25 वर्षों में उत्तराखंड में कई बार बादल फटने की घटनाएँ हुई हैं। इनमें जान-माल की भारी क्षति हुई। नीचे वर्षानुसार प्रमुख घटनाएँ और उनसे भारी नुकसान हुआ।
2003 उत्तरकाशी, वरुणावत पर्वत से भूस्खलन भारी नुकसान।
2010 पिथौरागढ़ (मुनस्यारी) दर्जनों मकान बहे, 35 की मौत हुई।
2012 में उत्तरकाशी में अस्सी गंगा में बाढ़।
2013 केदारनाथ (रुद्रप्रयाग) सबसे भीषण आपदा, बादल फटा, चोराबाड़ी ग्लेशियर टूटने से मंदाकिनी नदी में बाढ़ आ गई। इसमें केदार पुरी को बड़ी तवाही मचाई। लगभग पांच हजार लोगों की मौत हुई। इसके अलावा पहाड़ के कई स्थानों पर भारी जनधन की हानि भी हुई।
2016 में सीमांत जिलों चमोली और पिथौरागढ़ अति वृष्टि से कुछ मकान ध्वस्त हुए तथा 15 लोगों की मौत हुई।
7 फरवरी 2021 ज्योर्तिमठ विकासखंड के रैणी गांव में ग्लेशियर टूटने से धौली गंगा में बाढ़ आई। जिसके चलते 206 लोगों की मौत हुई।
2023 में रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर 10 लोग कालकावलित हुए।
5 अगस्त 2025 उत्तरकाशी गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग में धराली में बादल फटने की घटना । जिसमें कई होटल, होमस्टे ,व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साथ ही कई वाहनों के दबे होने की आशंका। भारी जन और धन की हानि। इसके अलावा हर्षल और सुखी टॉप में भी नुकसान।
पांडव कालीन कल्प केदार मंदिर इस क्षेत्र की धार्मिक विरासत है। वह भी इस आपदा की भेंट चढ़ा।

# बादल फटना एक प्राकृतिक आपदा है। यदि समय रहते चेतें, तो इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों को स्थानिक भौगोलिक परिस्थितियों और पारिस्थितिकी तंत्र के अनुरूप किए जाने की जरूरत है। जिस तरह से नदियों और नालों के समीप अननियोजित तरीके से निर्माण किए गए हैं। उन पर रोक लगाई जानी आवश्यक है। सरकार को चाहिए कि ऐसे निर्माण कार्यों को चिन्हित करे। ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
मध्य हिमालय क्षेत्र में आए दिन हो रही इस तरह की घटनाओं के चलते केंद्र सरकार को प्राकृतिक आपदाओं के लिए एक राष्ट्रीय नीति का बनाने की आवश्यकता है।

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