-धर्मेन्द्र चौधरी (सामाजिक चिंतक)
उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद के निकट एक ऐसा कांड घटित हुआ, जिसने सोशल मीडिया के पटल पर तहलका मचा दिया। कई दिनों से विभिन्न भाइयों द्वारा व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर जैसे मंचों पर एक ही कथा दोहराई जा रही थी। कथा के अनुसार, एक माता-पिता अपनी पुत्री के साथ खेत की ओर जा रहे थे। तभी कुछ क्रूर हत्यारों ने पुत्री को खेतों में घसीटना प्रारंभ कर दिया। माता ने अपनी संतान की रक्षा का प्रयास किया, तो उन वहशियों ने धारदार हथियार से माता को बुरी तरह काट डाला। इलाज के दौरान माता की मृत्यु हो गई। पुत्री का अपहरण कर लिया गया। यह कथा इतनी मार्मिक थी कि सोशल मीडिया पर यह वायरल हो गई।
इस घटना ने राजनीतिक दलों के नेताओं को मैदान में उतरने के लिए प्रेरित किया। विपक्षी दल चिल्लाने लगे, “दलित बेटी को न्याय मिलना चाहिए!” वहीं नेता भी पीछे न रहे। विशेष रूप से, बहुजन समाज पार्टी के नेता मायावती के अनुयायी रावण के अवतार में पल्ली काख में दबकर गांव पहुंच गए। उन्होंने उद्घोष किया, “अपने समाज की दलित बेटी को न्याय दिलाऊंगा। पीड़ित परिवार को इंसाफ प्रदान करूंगा।” यह दृश्य राजनीतिक नाटक का प्रतीक बन गया।
सोशल मीडिया के वीरों का उदय
सोशल मीडिया के भीष्म पितामहों ने इस मुद्दे को उठा लिया। वे लंबी-लंबी पोस्ट लिखने लगे, जिसमें दलितों पर ठाकुरों के अत्याचारों की ऐतिहासिक कथाएं बुनाई गईं। एक पोस्ट में लिखा गया, “ठाकुरों का दलितों पर अत्याचार सदियों पुराना है। यह घटना उसकी नवीनतम कड़ी है।” दूसरी पोस्ट में पुरानी घटनाओं का उल्लेख कर पूरे ठाकुर समुदाय को निशाना बनाया गया। ये वीर न्याय दिलाने का बीड़ा उठाए हुए थे, किंतु सत्य की खोज में उनकी कोई रुचि न थी। वे केवल भावनाओं को भड़काने में तत्पर थे।
इस प्रकार की पोस्टों ने लाखों व्यूज प्राप्त किए। हैशटैग जैसे #दलितबेटीकोइंसाफ, #ठाकुरअत्याचार और #मेरठकांड ट्रेंड करने लगे। लोग बिना जांच-पड़ताल के शेयर करने लगे। परिणामस्वरूप, पुलिस पर दबाव बढ़ गया। जनता सड़कों पर उतरने को तैयार हो गई। राजनीतिक दल वोट बैंक सुदृढ़ करने के लिए तैयारियां करने लगे।
पुलिस की जांच और सत्य का प्रकटीकरण…..?
पुलिस ने भागदौड़ मचाई। कल ही उन्होंने लड़की को हरिद्वार से बरामद कर लिया। वास्तव में, यह अपहरण का कांड न होकर आपसी सहमति का प्रकरण था। आरोपी ठाकुर युवक और दलित लड़की वर्षों से प्रेम संबंधों में थे।
यह खुलासा जातिवादी कीड़ों के मुंह पर तमाचा बन गया। सोशल मीडिया के वीर चुप हो गए। नेताओं की सारी मेहनत पर पानी फिर गया। उन्होंने सोचा था कि इस जलती आग में घी, तेल डालकर आगामी चुनावों हेतु वोट पका लेंगे। किंतु सत्य ने उनकी चाल को विफल कर दिया।
जातिवाद की राजनीति: एक सामाजिक विडंबना……..?
यह घटना भारतीय समाज में व्याप्त जातिवादी राजनीति का प्रतीक है। नेता सत्य की परवाह किए बिना घटनाओं को जाति के चश्मे से देखते हैं। यदि पीड़ित दलित है, तो इसे ठाकुरों या ब्राह्मणों का अत्याचार बता दिया जाता है। यदि पीड़ित उच्च वर्ण का है, तो विपरीत कथा गढ़ी जाती है। मेरठ कांड में भी यही हुआ। नेताओं ने परिवार की पीड़ा का लाभ उठाने का प्रयास किया, किंतु जांच ने उनकी मंशा उजागर कर दी।
ऐसे अनेक उदाहरण इतिहास में उपलब्ध हैं। हाथरस कांड में भी प्रारंभिक अफवाहें जातिवादी रंग ले लीं, किंतु बाद में सत्य सामने आया। कठुआ प्रकरण में भी सोशल मीडिया ने न्याय को प्रभावित करने का प्रयास किया। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि कैसे अफवाहें समाज को विभाजित करती हैं।
सोशल मीडिया का दोहरा चरित्र
सोशल मीडिया आधुनिक युग का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। यह सूचना का भंडार है, किंतु अफवाहों का केंद्र भी। मेरठ कांड में 99.99 प्रतिशत मामलों में सहमति ही सिद्ध हुई। सोशल मीडिया के वीरों से यही कहना चाहूंगा कि आज इतना आसान नहीं है न्याय का बीड़ा उठाना। बिना सत्य जाने पोस्ट लिखना समाज को विषाक्त करता है। वे लंबी कहानियां लिखते हैं, किंतु पुलिस रिपोर्ट पढ़ने की फुरसत नहीं करते।
सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं को चाहिए कि वे फैक्ट-चेक करें। वेबसाइट जैसे Alt News या Boom Live जैसी संस्थाएं सत्य की पड़ताल करती हैं। किंतु अधिकांश लोग भावनाओं के वशीभूत हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, निर्दोषों का सामाजिक बहिष्कार होता है। ठाकुर समुदाय के लोगों को बिना अपराध के कोसा गया। दलित परिवार को राजनीतिक उपकरण बनाया गया।
वास्तव में, प्रेम सीमाओं को लांघता है। जाति की दीवारें सर्दी की भांति ठंडी पड़ जाती हैं जब हृदय गर्म होते हैं। यह घटना सिद्ध करती है कि सहमति वाले संबंधों में अपहरण का कोई स्थान नहीं। पुलिस ने साक्ष्यों से सिद्ध कर दिया कि यह प्रेम का प्रकरण था, न कि अत्याचार का।
नेताओं की मंशा और चुनावी चालें
नेताओं ने इस घटना को चुनावी लाभ के लिए उपयोग करने का प्रयास किया। विपक्ष ने दलित वोट एकत्रित करने की चेष्टा की, जबकि सत्ताधारी पक्ष ने उच्च वर्णों को एकजुट करने का। किंतु सत्य ने सबको निरुत्तर कर दिया। भारत में जातिवादी राजनीति एक विडंबना है। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जाति उन्मूलन की बात की, किंतु आज भी नेता इसी पर टिके हैं। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में ऐसी घटनाएं वोट बैंकिंग का हथियार बनेंगी।
इस कांड से सबक लेना आवश्यक है। प्रथम, सोशल मीडिया उपयोगकर्ता सत्यापित सूचना ही शेयर करें। द्वितीय, पुलिस को स्वतंत्र जांच का अवसर दें। तृतीय, नेता भावनाओं का शोषण न करें। चतुर्थ, शिक्षा के माध्यम से जातिवाद का उन्मूलन करें। पंचम, प्रेम संबंधों में सहमति को सम्मान दें।
सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिए। फर्जी खबर फैलाने वालों पर Information Technology Act के तहत दंड। स्कूलों में मीडिया साक्षरता अनिवार्य हो। तब ही समाज सत्य की ओर अग्रसर होगा।
सत्य ही विजयी………?
मेरठ कांड ने सिद्ध कर दिया कि अफवाहें क्षणिक होती हैं, सत्य शाश्वत। सोशल मीडिया के वीरों, नेताओं और जातिवादियों को मुंह की खानी पड़ी। यह घटना समाज को चेतावनी है जल्दबाजी में न्याय न मांगें। धैर्य से सत्य का इंतजार करें। तब ही न्याय की देवी अंधी न रहेगी। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एकता ही सफलता का मंत्र है। जाति से ऊपर उठकर मानवता को अपनाएं।


