भारत में चरित्र निर्माण क्रांति की पुकार — “जन सामान्य मंच” की पहल से नए युग का आह्वान
वर्तमान समय का भारत बाहरी रूप से विकासशील और तकनीकी रूप से प्रगतिशील अवश्य दिखता है, परंतु भीतर से वह एक गहरी नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संकट से गुजर रहा है। यही वह दौर है जब देश को केवल राजनीतिक परिवर्तन की नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण क्रांति की आवश्यकता है। आज जब धर्म, राजनीति, समाज, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और न्याय व्यवस्था—सभी क्षेत्र अपने मूल मूल्यों से भटक रहे हैं, तब “जन सामान्य मंच” जैसे संगठन का यह आह्वान कि भारत को चरित्र के पुनर्निर्माण की दिशा में संगठित क्रांति चाहिए, न केवल समयानुकूल है बल्कि अनिवार्य भी है। मंच के वरिष्ठ सदस्यों का यह विचार कि अब केवल चुनाव जीतने या सत्ता पाने से भारत का उद्धार नहीं होगा, बल्कि इसके लिए नैतिकता, सत्य और ईमानदारी के सिद्धांतों पर आधारित एक राष्ट्रीय चेतना का निर्माण आवश्यक है — यह सोच भारतीय समाज के लिए नई दिशा दिखाने वाली है।
आज भारत के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है, वह केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक पतन की है। मानवीय मूल्य निरंतर गिरते जा रहे हैं। धर्म राजनीति का हथियार बन गया है, शिक्षा नौकरी पाने का साधन बन गई है, और राजनीति सेवा के बजाय अवसर का खेल बन चुकी है। औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन दोनों ही बिगड़ रहे हैं। गाँव और शहर दोनों ही अपनी आत्मा खोते जा रहे हैं। ऐसे समय में यदि देश को दिशा देनी है, तो केवल नारे या योजनाओं से नहीं, बल्कि एक चरित्र निर्माण आंदोलन से देना होगा — जो हर व्यक्ति के भीतर सत्य, कर्तव्य, करुणा, और ईमानदारी के बीज बो सके।
जन सामान्य मंच ने इस दिशा में जो पहल की है, वह वास्तव में एक “नैतिक जागरण आंदोलन” की रूपरेखा है। संगठन का यह मत है कि देश के हर क्षेत्र में — चाहे वह धार्मिक क्षेत्र हो, राजनीतिक व्यवस्था हो, सामाजिक संस्थाएँ हों या आर्थिक तंत्र — सबमें एक “चरित्र निर्माण क्रांति” की जरूरत है। क्योंकि जब व्यक्ति का चरित्र मजबूत होगा, तभी समाज सशक्त होगा, और जब समाज सशक्त होगा, तभी राष्ट्र महान बनेगा। संगठन के विचारक कहते हैं कि यह केवल दर्शन या उपदेश का विषय नहीं है, बल्कि यह विज्ञान और क्रियाशीलता का विषय है। चरित्र निर्माण कोई कल्पना नहीं, बल्कि जीवन की व्यवहारिक आवश्यकता है।
हाल ही में संगठन के वरिष्ठ सदस्य और राष्ट्रीय विधि विशेषज्ञ अनिल मिश्रा जी द्वारा ग्वालियर में आयोजित “हवन कार्यक्रम” में जिस तरह सभी दलों ने एकजुट होकर समर्थन दिया, वह इस बात का संकेत है कि यदि उद्देश्य पवित्र हो और दिशा सही हो, तो भारत में विचारधाराओं की दीवारें भी गिर सकती हैं। जन सामान्य मंच ने घोषणा की है कि इस आंदोलन को व्यापक जनभागीदारी के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा। देश के सभी प्रबुद्ध जनों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, शिक्षा जगत, और युवाओं से संवाद किया जाएगा, ताकि 30 नवंबर को एक राष्ट्रीय घोषणा-पत्र जारी किया जा सके — जिसमें यह तय किया जाएगा कि “राष्ट्र का चरित्र कैसे सुधरेगा और हर संगठन उसका क्या योगदान देगा।”
इस आंदोलन का लक्ष्य केवल किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक दृष्टि का परिचायक है जो कहती है — “बुराई का अंत और अच्छाई की स्थापना” ही सच्चे भारत का उद्देश्य है। मंच का मानना है कि जब तक झूठ, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव और अज्ञान का अंत नहीं होगा, तब तक भारत का पुनर्निर्माण अधूरा रहेगा। संगठन यह भी स्पष्ट करता है कि यह कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक-सामाजिक क्रांति है, जिसमें प्रत्येक नागरिक का सहभाग अनिवार्य है। यह आंदोलन “आर-पार की लड़ाई” के रूप में लड़ा जाएगा — पर हथियारों से नहीं, विचारों से; नफरत से नहीं, सत्य और नीति से।
“जन सामान्य मंच” ने यह भी कहा है कि भारत की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में जो पीड़ा अनुचित कानूनों, असमान नीतियों और विभाजनकारी विचारों से उत्पन्न हो रही है, उसे समाप्त करना आवश्यक है। विशेष रूप से उन्होंने यह मुद्दा उठाया है कि एससी/एसटी एक्ट जैसे कानूनों से जो सामाजिक पीड़ा और असंतुलन पैदा हुआ है, उस पर संवेदनशील पुनर्विचार होना चाहिए। मंच का दृष्टिकोण यह है कि आरक्षण और अवसर की व्यवस्था आर्थिक और गुणवत्ता के आधार पर होनी चाहिए, ताकि समाज में समरसता और संतुलन कायम रहे। यह दृष्टिकोण जातिगत टकराव को नहीं बढ़ाता, बल्कि सामाजिक न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है — जिसमें हर व्यक्ति को उसके परिश्रम और योग्यता के अनुसार स्थान मिले।
मंच यह भी मांग करता है कि भारत के बौद्धिक और ऐतिहासिक नायकों, जैसे सर बी. एन. राव, जिनके योगदान को इतिहास ने भुला दिया है, उनकी प्रतिष्ठा फिर से स्थापित की जाए। यह आंदोलन उन सभी भूले-बिसरे व्यक्तित्वों को सम्मान देने की दिशा में भी एक प्रयास है जिन्होंने भारत की वैचारिक नींव रखी, पर जिन्हें इतिहास की राजनीति ने हाशिए पर डाल दिया। संगठन का स्पष्ट संदेश है — “इतिहास में सत्य की स्थापना हो और मिथ्या का अंत।” शिक्षा-पाठ्यक्रमों में वे सभी विकृतियाँ समाप्त की जाएँ जो राष्ट्र की आत्मा को कमजोर करती हैं।
यह “चरित्र निर्माण क्रांति” केवल उपदेश नहीं, बल्कि एक राष्ट्रव्यापी जन-जागरण अभियान के रूप में आकार ले रही है। जन सामान्य मंच आने वाले दिनों में देशभर में जनसंपर्क यात्राएँ, चिंतन-सत्र, युवा संवाद, और सामाजिक विमर्श आयोजित करेगा। इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को यह संदेश देना है कि राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों या रैलियों से नहीं, बल्कि चरित्र, कर्म और समर्पण से होता है। संगठन युवाओं को इस दिशा में एक नए “सत्य सनातन” आंदोलन से जोड़ना चाहता है — जिसमें नैतिकता, करुणा और सच्चाई को पुनः जीवन का आधार बनाया जाए।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब अधिकांश दल एक-दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त हैं, जब धार्मिक मंच विभाजन के केंद्र बन गए हैं, और जब सामाजिक संगठन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं — ऐसे समय में यह पहल एक नई आशा जगाती है। जन सामान्य मंच का यह संदेश कि “चरित्र निर्माण ही राष्ट्र निर्माण है” उस प्राचीन भारतीय दर्शन को पुनर्जीवित करता है जो कहता है — “व्यक्ति सुधार से ही समाज सुधार संभव है।” जब व्यक्ति भीतर से सुधरेगा, तो परिवार सुधरेगा; जब परिवार सुधरेगा, तो समाज सुधरेगा; और जब समाज सुधरेगा, तो भारत अपने वास्तविक स्वरूप में पुनः विश्वगुरु बन सकेगा।
भारत का भविष्य केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक समृद्धि से तय होगा। जब तक हम अपने बच्चों को केवल सफलता सिखाएँगे, और सत्य नहीं; केवल विज्ञान सिखाएँगे, और विवेक नहीं — तब तक यह देश केवल तकनीकी रूप से उन्नत रहेगा, लेकिन आत्मिक रूप से खोखला होता जाएगा। जन सामान्य मंच का यह आंदोलन इसी खोखलेपन को भरने का प्रयास है। यह हर व्यक्ति से कहता है — “पहले अपने भीतर के चरित्र को जागृत करो, फिर राष्ट्र खुद जाग उठेगा।”
30 नवंबर को जब यह संगठन अपने राष्ट्रीय घोषणा-पत्र के माध्यम से देश के सामने अपना “चरित्र निर्माण क्रांति मॉडल” प्रस्तुत करेगा, तब संभवतः भारत एक नए अध्याय की ओर कदम बढ़ाएगा — जहाँ धर्म और राजनीति की सीमाएँ नहीं, बल्कि मानवता और सत्य का समन्वय होगा। इस आंदोलन का उद्देश्य किसी को तोड़ना नहीं, बल्कि सबको जोड़ना है — सबको सत्य, नीति और नैतिकता के सूत्र में बाँधना है। यही “सत्य सनातन” की पुनः स्थापना का मार्ग है, यही भारतीय सभ्यता की आत्मा है।
आज भारत के हर नागरिक को यह सोचना होगा कि वह इस क्रांति का दर्शक बनना चाहता है या सहभागी। क्योंकि इतिहास यह तय करता है कि जब कोई समाज अपने चरित्र के पतन को देखता है और चुप रहता है, तो वह स्वयं पतन का भागी बन जाता है। लेकिन जो समाज अपने भीतर परिवर्तन का साहस करता है, वही समाज अमर बनता है। जन सामान्य मंच का यह आह्वान उसी साहस का प्रतीक है — एक ऐसा आह्वान जो कहता है,
“बुराई से समझौता नहीं, अच्छाई की स्थापना तक संघर्ष जारी रहेगा।”
यही सच्चे अर्थों में भारत की चरित्र निर्माण क्रांति की शुरुआत है।


