वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई वर्तमान भारत के लिए महिला सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल हैं – डा. श्रीप्रकाश मिश्र

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वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई वर्तमान भारत के लिए महिला सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल हैं – डा. श्रीप्रकाश मिश्र

वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर मातृभूमि सेवा मिशन मन तत्वावधान में मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा वीरांगना संवाद कार्यक्रम संपन्न।

कुरुक्षेत्र

वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मन मस्तिष्क में रानी लक्ष्मी बाई की छवि उभरने लगती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना ही थीं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवन काल में ही ऐसा आदर्श स्थापित करके विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई वर्तमान भारत के लिए महिला सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल हैं। कहा जाता है कि सच्चे वीर को कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से विमुख नहीं कर सकता। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था। लक्ष्मीबाई को अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म स्थापित करने वाला प्यार था। यह विचार वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने मातृभूमि शिक्षा मंदिर द्वारा आयोजित वीरांगना संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किये। कार्यक्रम में मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों एवं अतिथियों द्वारा रानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर माल्यार्पण, पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यर्थियों ने वीरांगना रानी लक्ष्मी के महान क्रांतिकारी के जीवन पर अनेक प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किये।

डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया। वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोपड़ी को चिता का रुप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया। और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।

डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा जिन महापुरुषों के मन वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं।सन् 1850 मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। लक्ष्मीबाई सदैव युद्ध में अपनी कुशलता का परिचय देती रहीं। 18 जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ और रानी ने अपनी सेना का कुशल नेतृत्व किया। वे घायल हो गईं और अंतत: उन्होंने वीरगति प्राप्त की। के लिए बलिदान का संदेश दिया। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान सदैव भारत मन इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा। कार्यक्रम में तेलांगाना भी श्रीमदभगवदगीता आनंद समिति के अध्यक्ष शेषगिरि राव एवं भगवानदास भार्गव की गरिमामई उपस्थिति रही। कार्यक्रम में मिशन के सदस्य, विद्यार्थी एवं अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।

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